Can Tulsi leaf be eaten during Ekādaśī? एकादशी के दिन तुलसीपत्र ग्रहण करना चाहिए या नहीं ?

I have heard we should not have Tulsi leaves on Ekādaśī. If this is true, what is the reason for this?

It is said that on the day of Ekādaśī if you are fasting and eat Tulsi leaves then your fast breaks. Many times, in Kathas, I have explained what faith is as explained by our great saints. Faith is the belief that the teachings of our scriptures and saints are the ultimate truth. On the path of spiritual practice, the first and the most important thing is faith. Therefore, we should have faith in these teachings and practice them while believing in it.

Now, why should we not eat the Tulsi leaves on that day? Ordinarily, other plants consume carbon dioxide and release oxygen during the day whilst the opposite takes place at night. However, Tulsi is a plant whose amount and ability to release oxygen is much higher. So, as a sign of showing respect we should avoid eating Tulsi leaves.

There can be many other reasons as well which we may not know but the important thing is practicing what we have been advised with faith. In addition, offering Tulsi leaf to God on the days of Ekadashi is of great significance.

Understanding this from a broad perspective, without food, the body will lose strength. Therefore, on the day of Ekādaśī we need to have some food like fruits, or the dishes accepted to be eaten during a fast or even just milk. Our body needs some food so we should consume little on Ekādaśī and avoid foods like grains. Any type of fasting develops our self-control. Therefore, somethings should be eaten today and some not, these rituals are generally to build up control. Secondly fasting helps us remain alert.  We are alert for example that on Ekādaśī we should not eat Tulsi Patra today or anything that may break our fast.

Fasting helps us practice self-control and be alert. It is a good question and it can have many other scientific reasons which don’t know at this point but as I said earlier, we should have faith in our scriptures and accept the advice provided to us.

मैंने सुना है कि एकादशी के दिन तुलसीपत्र ग्रहण नहीं करना चाहिए।  क्या यह सही है तो कारण क्या है ?

विधि-निषेध की बात शास्त्रों में है ही है।  ये कहा गया है कि एकादशी के दिन तुलसीपत्र ग्रहण करने से किया गया व्रत-उपवास टूटता है, उसका भंग होता है।  देखो! मानने से शास्त्र है।  मैंने कथाओं में आप लोगों के साथ चर्चा करते हुए, महापुरुषों के मतानुसार व्याख्या की है कि श्रद्धा क्या है? श्रद्धा का तात्पर्य है – शास्त्रों और संतों की वाणी शत प्रतिशत सत्य है, ऐसी दृढ़ निष्ठा का नाम है ‘श्रद्धा’। साधना के पथ पर सबसे पहले आवश्यक है श्रद्धा।  ‘आदौ श्रद्धा’ । गोस्वामी तुलसीदासजी भी जब रामचरितमानस में ज्ञान-दीपक की चर्चा करते हैं तब “सात्विक श्रद्धा धेनु सुहाई ” वहीं से प्रारम्भ किया है। तो सबसे पहले तो हम इन बातों में श्रद्धा करें और श्रद्धा के साथ उनका पालन करें।

अब क्यों नहीं खाना चाहिए उस दिन तुलसीपत्र ? साधारणतया तुलसी भी हमारी तरह है। साधारण वृक्ष दिन में कार्बन डाय ऑक्साइड लेते हैं और ऑक्सीजन देते हैं और कहते हैं रात्रि में इससे उल्टा होता है। लेकिन तुलसी ऐसा पौधा है जिसकी ऑक्सीजन देने की मात्रा और क्षमता बहुत ज्यादा है। तो इस दिन तुलसी का आदर करते हुए तुलसी को न लें। उसके और अन्य कारण भी हो सकते हैं। सब क्यों का जवाब हमारे पास न भी हो तब भी श्रद्धापूर्वक इसका पालन करना चाहिए।

वैसे तुलसी का सेवन बहोत लाभप्रद माना गया है। भगवान को भी हम तुलसी अर्पण करते हैं।  आज एकादशी के दिन भगवान को तुलसी अर्पण करने का एक विशेष महत्त्व है। एक मोटे-मोटे तौर पर देखा जाए तो बिना खाए तुम्हारा शरीर काम नहीं कर पाएगा, उसमें शक्ति नहीं रहेगी इसलिए कुछ आहार लेना भी पड़ता है। अत एव फलाहार, नहीं तो फलाहारी जो चीजें हैं, व्यंजन जो बनते हैं उसका आहार।  चाहे दूध का ही आहार लेकिन शरीर को आहार की आवश्यकता होती है तो वो लिया जाए और अन्न इत्यादि का त्याग किया जाए।

व्रत में हमारा संयम डेवलप होता है चाहे वो मौन व्रत ही क्यूँ न हो। इसलिए आज ये खाना चाहिए, आज ये नहीं खाना चाहिए इसका जो विधि-निषेध है पालन करना चाहिए। मोटे-मोटे तौर पर देखें तो संयम और दूसरा जागृति कि मेरे दिमाग में ये बात बैठ गई कि भई मैं गलती से भी आज तुलसीपत्र न ले लूँ या हम ऐसा कुछ न खा लें जिससे व्रत-भंग हो। तो व्रत में संयम और जागृति।  इसका अभ्यास बनता है।

उसके और वैज्ञानिक कारण भी हो सकते हैं जो मुझे इस वक्त पता नहीं है। लेकिन जैसा मैंने कहा शास्त्रों की बातों में श्रद्धापूर्वक स्वीकार करें। मैं और आप इस नियम का पालन करें।

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