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आज हनुमान जयंतीके अवसर पर जानते है कि हनुमानजीकी ठुड्डी (हनु) असामान्य क्यों है ?

मनोजवं मारुततुल्यवेगं जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्।
वातात्मजं वानरयूथमुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्ये।।

कथा :-
श्रीरामावतारके समय ब्रह्माजीने देवताओंको वानर और भालुओंके रूपमें पृथ्वी पर प्रकट होकर श्रीरामजीकी सेवा करनेका आदेश दिया था। इससे उस समय सभी देवता अपने-अपने अंशोंसे वानर और भालुओंके रूपमें उत्पन्न हुए।

इनमें वायुके अंशसे स्वयं रुद्रावतार महावीर हनुमानजीने जन्म लिया था। इनके पिता वानरराज केशरी और माता अञ्जनादेवी थीं। जन्मके समय इन्हें क्षुधापीड़ित देखकर माता अञ्जना वनसे फल लाने चली गयीं, उधर सूर्योदयके अरुण बिम्बको फल समझकर बालक हनुमानने छलाँग लगायी और पवन वेगसे जा पहुँचे सूर्यमण्डल।

उस दिन राहु भी सूर्यको ग्रसनेके लिए सूर्यके समीप पहुँचा था। हनुमानजीने फलप्राप्तिमें अवरोध समझकर उसे धक्का दिया तो वह घबराकर इन्द्रके पास पहुँचा। इन्द्रने सृष्टिकी व्यवस्थामें विघ्न समझकर बालक हनुमान पर वज्रका प्रहार किया, जिससे हनुमानजीकी बाँयी ओरकी ठुड्डी (हनु) टूट गयी।

अपने पुत्र पर वज्रके प्रहारसे वायुदेव अत्यन्त क्षुब्ध हो गये और उन्होंने अपना संचार बन्द कर दिया। वायु ही प्राणका आधार है, वायुके संचरणके अभावमें समस्त प्रजा व्याकुल हो उठी। समस्त प्रजाको व्याकुल देख प्रजापति पितामह ब्रह्माजी सभी देवताओंको लेकर वहाँ पहुँच गये, जहाँ अपने मूर्छित शिशु हनुमान् को लिए वायुदेव बैठे थे। ब्रह्माजीने अपने हाथके स्पर्शसे शिशु हनुमान् को सचेत कर दिया। सभी देवताओंने उन्हें अपने अस्त्र-शस्त्रोंसे अबध्य कर दिया। पितामहने वरदान देते हुए कहा- मारुत! तुम्हारा यह पुत्र शत्रुओंके लिए भयंकर होगा। युद्धमें इसे कोई जीत नहीं सकेगा।

ऐसे विश्ववन्द्य महाबली और श्रीरामचन्द्रके अनन्य भक्त हनुमानजीके जप, ध्यान, उपासना, व्रत और उत्सव आदि करनेसे सब प्रकारके संकट दूर होते हैं।

Written by: Rishi Utsavbhai Khambholja
(-Sandipani Karmakand Division)

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