How do we overcome the financial difficulties and depression caused by the current pandemic? वर्तमान परिस्थिति में अवसादमुक्त होने के उपाय

How do we overcome the difficulties and depression due to financial losses as well as lack of interaction in the society in the current circumstances of the pandemic?

This world consists of both joy and sorrow. No one is 100% happy or sorrowful. This world is an arena, and joy and sorrow are two wrestlers wrestling in it. Sometimes, the wrestler named sorrow knocks down the wrestler named joy and sometimes the wrestler named joy knocks down the wrestler named sorrow. But they are just knocked down. They have not died. Therefore, in times of sorrows, when it feels as if sorrow is dominant or winning that does not mean that joy has died or ended. In times of happiness sometimes we become so elated, but the truth is we have knocked down sorrow. It has not died.

Similarly, this world consists of the dualities of joy and sorrow until we live in it. Just like we cope with summer and winter, similarly we need to tolerate joy and sorrow, respect and disrespect, success and failure. We have to tolerate these dualities. This tolerance is penance. If you do not have enough courage to endure misery, you might break down and be disappointed; you might become a victim of depression. We see in the current times many people dealing with mental health issues and are in great need of counselling. Likewise, we must tolerate happiness. One who cannot endure happiness becomes arrogant and careless.

When you learn to endure failure, it will not let you fall apart or disappoint you. Instead, you will learn something from this failure. Experience in life is very important. When we learn something from our failure, we can make that failure our ladder to success.

Dualism is the way of this world and we must understand that this is always going to stay. Neither happiness nor sorrow is eternal. No situation is permanent; it is forever changing. 

So, let us understand from a spiritual and practical perspective that, those previous circumstances have been changed and we are now stuck in the present circumstances. Due to the lockdown, many businesses are seeing a downfall, many have lost their jobs; it has become a question of existence. Due to losing jobs, the laborers are not able to feed themselves and they are going through an existential crisis. Similarly, big industries are facing the risk of going into administration.

Consequently, we must have patience. That is why spirituality as well as Dharma are important and the reason, we need Kathas. For people who do not believe this might be a subject of criticism, but we are people with faith, seekers of knowledge and trust in God. Many people, who perceive through logic and evidence think that God is just an imagination for sentimental people. I say that if although that is not the case, if at all God is just an imagination of sentimental people, even then then, it is truly a blessing. An imagination that does not let you break down can be very helpful. You take shelter to an energy that is capable of doing everything, and beyond. When you take shelter of such a power that is supreme, which is so unlimitedly great that He can do the possible and the impossible, and also the opposite of both of these situations, such Almighty, it prevents you from falling prey to depression or grief.

Vedas also explain this.

Puruṣa evedaṁ sarvam īrśāvāsyamidaṁ sarvaṁ yatkiñca jagatyāṁ jagat |

This is the first mantra of Iśāvāsya Upanishad. Therefore whether, you believe in Lord Krishna or Lord Ram, as the almighty or not, even if you see them as an ideal human, this ultimate existence as a whole, the Supreme Truth, is known as Iśvar.


It’s gross form, subtle form and above both of them, it’s extraordinary form, which exists is what we call Hari or Iśvar or God.

Thus, let us take shelter in Him and have faith in Him so that we can get through such circumstances. Even in times of happiness if we stay in the shelter of God then we will not become arrogant. Happiness will not let us become careless but we will see that happiness as a blessing of God, prasād and His grace. That prasād of happiness should then also be shared because prasād should not be eaten alone. This way, you will share your happiness with others in the world.

We should learn to tolerate both joy and happiness with the right discernment. Both can lead to our well-being.

वर्तमान में चल रही भयानक विभीषिका के चलते व्यवसाय में आर्थिक नुकसान  तथा समाजिक और लोक व्यवहार में आई कमी के कारण  उत्पन्न अवसाद से कैसे मुक्त हो सकते हैं ? 

एक बात तो हम ये समझ लें कि संसार सुख-दुःखात्मक है।  यहाँ १००% सुख नहीं है और १००% दुःख भी नहीं है।  संसारके इस अखाड़े में सुख और दुःख नाम के दो पहलवान कुश्ती लड़ रहे हैं।  कभी-कभी सुख नाम के पहलवान को पटककर दुःख वाला पहलवान उसके ऊपर सवार हो जाता है और कभी दुःख को पटककर सुख वाला पहलवान उसके ऊपर सवार हो जाता है।  लेकिन पटका है, नीचे दबाया है, वो मरा नहीं है।  तो दुःख के समय में, जब दुःख विजयी बनता हुआ दिख पड़ रहा है, ऐसे समय में भी सुख मर नहीं गया है। और सुख के समय में कभी-कभी हम इतने बेहोश हो जाते हैं, लेकिन आपने अपने पैरों के नीचे दुःख को दबाया हुआ है।  वो मर नहीं गया है।

सुख-दुःखात्मक  संसार है।  जब तक हम संसार में है, तो जिस प्रकार हम ठंडी और गरमी  को सहन करते हैं उसी प्रकार सुख, दुःख आदि को सहन करना चाहिए। मान-अपमान को सहन करना चाहिए।  सफलता- विफलता सबको सहन करना चाहिए।  ये सहना तप है।  यदि दुःख को सहने की शक्ति तुम्हारे में नहीं रही तो तुम टूट जाओगे, बिखर जाओगे, हताश हो जाओगे, निराश हो जाओगे।  अवसाद के शिकार बन जाओगे।  डिप्रेशन तुम्हें पकड़ लेगा।  वर्तमान समय में बहोत प्रकार की मानसिक समस्याओं का सामना कई लोग कर रहे हैं।  उनकी कॉउंसलिंग की बहुत ज्यादा जरुरत महसूस हो रही है।

उसी प्रकार सुख को भी सहना है।  जो सुख को सहन नहीं कर पाता  वो सुख का अभिमानी बन जाता है।  सुख उसे बेहोश कर देता है।  वो एकदम असावधान हो जाता है।  ऐसा न हो इसलिए सुख और दुःख दोनों ।  उसी तरह सारे द्वंद्व, मान-अपमान, सफलता-विफलता को सहन करो।   

आप कुछ सीखेंगें और वो आपका अनुभव बन जाएगा। अनुभव बहुत बड़ी चीज़ है। विफलता से हम कुछ सीखते हैं तो उसी विफलता को सफलता की सीढ़ी बना लेते हैं।

तो ये द्वंद्वात्मक स्थिति तो रहने वाली ही है ।  यहाँ लगातार सुख नहीं रहता और लगातार दुःख नहीं रहता।  कोई परिस्थिति कायम नहीं है। परिस्थिति परिवर्तनशील है।  एक बात ये समझ लो आध्यात्मिक और विवेक की दृष्टि से, वो वाली परिस्थिति जो थी और ये वाली परिस्थिति में हम फँसे हुए हैं। लोकडाउन में फंसे हुए हैं, कोरोना वायरस का भय है।  लॉकडाउन के चलते कई लोगों के व्यवसाय चौपट हो रहे हैं।  कई लोगों ने अपनी नौकरियाँ खोइ, अपने रोजगार गँवाये। अब उनके अस्तित्व का सवाल हो गया है। उसी तरह बड़े-बड़े व्यापार को, उद्योगों को भी अपने अस्तित्व को बनाये रखने का प्रश्न उठ खड़ा हुआ है।

तो सबसे पहले तो धैर्य का पालन करे | इसीलिए अध्यात्म, धर्म और कथा की जरुरत है। जिनको इस पर भरोसा नहीं उनके लिए ये आलोचना का विषय हो सकता है।  लेकिन हम लोग  श्रद्धावान हैं, जिज्ञासावान हैं।  हम ईश्वर के प्रति आस्था रखने वाले हैं।  बुद्धि-प्रामाण्यवादी लोग कहते हैं कि ईश्वर भावुक लोगों की कोरी कल्पना है।  मैं कहता हूँ कि आपके कहने के अनुसार यदि ईश्वर भावुक लोगों की कल्पना है तो भी (वैसा है नहीं लेकिन) ये कल्पना बड़ी आशीर्वादरूप है। बड़ी मददगार साबित हो सकती है ये कल्पना, जो तुम्हे टूटने न दे।

तुम एक ऐसी शक्ति का सहारा लो जो सर्वसमर्थ है।  जो ‘कर्तुम् अकर्तुम् अन्यथाकर्तुं समर्थः परमेश्वरः’ ऐसी जो परमसत्ता है उसका आश्रय लेते हो तो आप टूटने से बच जाते हो।  आप निराशा का शिकार होने से बच जाते हो।  ये जो अस्तित्व है उसीका नाम ईश्वर है।  वही परमेश्वर है।  वेद भी कहते हैंपुरुष एवेदं सर्वम्’,  ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्’| ईशावास्योपनिषद्  का पहला ही मन्त्र है।

वो मोर-मुकुट-बंसी वाले कृष्ण को तुम भगवान  मानो न मानो, वो धनुष-बाण धारी, पीताम्बरधारी, किरीटकुण्डल को धारण किये हुए राम को तुम परब्रह्म मानो न मानो, एक आदर्श के रूप में  उनको देखो। तो ये जो परम अस्तित्व है, ये जो परमसत्ता है-‘सत्य’, इसकी जो सत्ता है, इसका जो अस्तित्व है उसीको हमने ईश्वर कहा है।  लेकिन ये जितना दीखता है उतना ही है ऐसी बात भी नहीं है।  ‘सर्वतस्पृत्वात्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम्’  उसका स्थूल रूप, उसका सूक्ष्मरूप और दोनों से परे उसका जो विलक्षणरूप है, वो जो ‘है’ उस ‘है’ का नाम है हरी, उस ‘है’ का नाम है ‘ईश्वर’।  उस अस्तित्व को ही हम परमात्मा बोलते हैं।

उसका आश्रय करना चाहिए। उस पर भरोसा होना चाहिए।  ऐसी जो परिस्थितियाँ समय-समय पर पैदा होती हैं उससे हम बाहर निकल सकते हैं।  सुख में भी हम उसका आश्रय बनाए रखें तो हम सुख में अभिमानी नहीं बनेंगे।  सुख हमें बेहोश नहीं होने देगा।  परन्तु यह सुख उस परमात्मा का आशीर्वाद है, प्रसाद है, उनकी कृपा है। फिर भगवान के उस कृपा प्रसाद का वितरण भी होना चाहिए।  प्रसाद अकेले नहीं खाते, बाँटकर खाते हैं।  तो आप अपने सुख को समाज के साथ बाँटेंगे।

इस प्रकार हम सुख और दुःख दोनों को विवेकपूर्वक सहना सीखें।  दोनों हमारा कल्याण कर सकते हैं।

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